शनिवार, 28 अगस्त 2021

नर हो, ना निराश करो मन को

 कवि मैथिलीशरण गुप्त जी की सुप्रसिद्ध कविता है -

'नर हो ना निराश करो मन को

कुछ काम करो, कुछ काम करो।

जग में रहकर कुछ नाम करो,

यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो ?

जब हम ‘नर हो, न निराश करो मन को’ पंक्ति को सुनते हैं तो ऐसा लगता है जैसे कोई हमें चुनौती देते हुए  कह रहा हो कि मानव होकर तुम सांसारिक जीवन की छोटी कठिनाइयों  से घबरा जाते हो क्योंकि तुमने अभी तक जीवन की बाधाओं का सामना करना नहीं सीखा है। 

हम मनुष्य हैं और वीरता हमारे पास है। एक बार की असफलता से इस तरह से निराश नहीं होना चाहिए हमें परिस्थितियों का डटकर सामना करना चाहिए। एक छोटी सी चिड़िया भी कभी भी हार नहीं मानती है, वह अपने घोंसले को बनाने के लिए बहुत मेहनत करती है। दूसरी तरफ मनुष्य होता है जो छोटी-छोटी बात पर निराश होकर बैठ जाता है उसे कभी भी निराश नहीं होना चाहिए। उसे अपने लक्ष्य तक पहुंचने तक परिश्रम करते रहना चाहिए।

क्योंकि – 

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती।

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।।

जब कोई इंसान अपने लाभ या उन्नति के लिए काम करता है तो उसकी ताकत होता है उसका मानसिक बल। किसी विद्वान् ने कहा है – मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। जब तक मनुष्य को अपने मानसिक बल पर विश्वास होता है उसे कोई नहीं हरा सकता है, लेकिन जब मन मर जाता है तो व्यक्ति भी हार जाता है।

मन मनुष्य की समस्त शक्तियों का केंद्र है. किसी भी मनुष्य के व्यक्तित्व का दर्पण उसका मन ही है. कहा भी गया है –

तोरा मन दर्पण कहलाए,

भले बुरे सारे कर्मों को,

देखे और दिखाए,

तोरा मन दर्पण कहलाए..

इसी मानसिक बल के आधार पर  हनुमानजी ने विशाल सागर को पार कर लिया था। नेपोलियन और गुरु गोबिंद सिंह जी ने इसी बल के आधार पर अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी। हमारे वीर क्रांतिकारी यदि निराश होकर बैठ जाते तो क्या हम आजादी हासिल कर पाते ?

विश्व विजय प्राप्त करने वाले सिकंदर की सफलता का राज यही था कि उसने मन में विश्वविजय की ठान रखी थी. वहीं जब उसका मन शिथिल हुआ, मन की हार ही उसके पराजय का कारण बनी. पराक्रमी महान सम्राट अशोक ने कलिंग जैसे वैभवशाली साम्राज्य को जीत लेने के बाद भी स्वयं को पराजित महसूस किया क्योंकि निरपराध लोगों के प्राण लेने के लिए उसके मन ने उसे उत्तरदायी ठहराया।

जैसी हमारे मन की हालत होती है हमारा जीवन के प्रति दृष्टिकोण भी वैसा ही हो जाता है। जब हमारा मन प्रसन्न रहता है तो हमें प्रकृति का हर रूप सुंदर लगता है, मौसम सुहाना लगता है, सब कुछ शुभ और मंगलकारी लगता है किंतु अगर मन ही दुखी और निराश हो तो प्रकृति का हर रूप नीरस लगता है, सब चीजें विकृत रूप में नजर आने लगती हैं.

कहने का तात्पर्य यह है कि मन की सबलता ही व्यक्ति की सबलता है. शारीरिक रूप से हट्टा कट्टा व्यक्ति भी निर्बल ही कहलाएगा यदि उसका मन निर्बल हो।

अतः हमें स्वयं को बार बार याद दिलाते रहना चाहिए कि -

नर हो, ना निराश करो मन को

कुछ काम करो, कुछ काम करो।

भगवदगीता में श्रीकृष्ण ने मनुष्य को कर्ममार्ग पर चलने के लिए कहा है। हमें अपने मन की शक्तियों को पहचानकर, उन्हें अपने लक्ष्य पर केंद्रित करके कर्म में जुट जाना चाहिए। ईश्वर ने हमें यह सारा संसार दिया है, सारे संसाधन हमारे पास हैं। इस दुनिया में दशरथ मांझी जैसे लोग भी हुए हैं जिन्होंने अपने परिश्रम से पर्वत को काटकर समतल कर दिया। 

विपरीत परिस्थितियों से लड़कर सफलता के उच्चतम शिखर पर पहुँचने वाले नरवीरों के उदाहरण इतिहास में भरे पड़े हैं और वर्तमान में भी ऐसे दृढनिश्चयी लोगों की संसार में कमी नहीं है। 

हमें कोई मार्ग दिखाएगा तब हम उस पर चलेंगे, ऐसा सोचकर निठल्ले बैठे रहनेवालों का जन्म व्यर्थ ही चला जाता है। अतः उठो, और अपने लिए मार्ग का निर्माण स्वयं ही करो।

कवि रामधारी सिंह दिनकर ने भी कहा है :

ख़म ठोंक ठेलता है जब नर पर्वत के जाते पाँव उखड़।

मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है।।

गुन बड़े एक से एक प्रखर।

हैं छिपे मानवों के भीतर।।


अगर मानव परिश्रम और साहस करना ही छोड़ देगा तो उसका समाज में विकास कैसे होगा? उसके लिए हर तरह की उन्नति के रास्ते बंद हो जायेंगे। इसीलिए मनुष्य को अपने मनुष्यत्व को सिद्ध करना ही होगा। कहते हैं ना कि भगवान भी उनकी ही मदद करता है जो अपनी मदद खुद करते हैं।

अगर कर्मठ लोग निराशा को हावी होने देते तो हमारे देश में और संसार में वो सब विकास आज तक हुए ही न होते जो अब तक  हुए हैं।

इसी वजह से कहा गया है कि नर होकर मन को निराश मत करो। निराशा की वजह से जीवन अंधकार से भर जाता है।

अंत में  इन पंक्तियों के साथ मैं उत्साह और आशावाद का आह्वान करती हूँ –

राह में मुश्किल होगी हजार,

तुम दो कदम बढाओ तो सही।

हो जाएगा हर सपना साकार, 

तुम चलो तो सही, तुम चलो तो सही।।

मुश्किल है पर इतना भी नहीं, 

कि तू कर ना सके।

दूर है मंजिल लेकिन इतनी भी नहीं, 

कि तू पा ना सके।

तुम चलो तो सही, तुम चलो तो सही।।

शुक्रवार, 12 मार्च 2021

एक बवाल ऐसा भी....

रात के ग्यारह बज रहे हैं। मैं हाथ में कापी पेन लिए बेडरूम से बालकनी, बालकनी से बेडरूम के चक्कर लगा रही हूँ। 'वे' मेरी इस 'नाइट वाक' से हैरान परेशान, हथेलियों पर ठुड्डी टिकाए कभी मुझे देखते हैं और कभी घड़ी को। आखिर ना रहा गया तो बोल उठे - 'ये क्या हो रहा है?'

मैं - एक कविता लिखनी है। विषय है - बवाल।
वे - ओह ! तो फिर ?
मैं - कुछ सूझ नहीं रहा...
वे - 'बवाल' विषय पर आप निश्चय ही बहुत बढ़िया लिख सकती हैं। फिर भी, आप चाहें तो ये नाचीज आपकी कुछ मदद कर सकता है । 
मैं - (शक्की नजरों से देखते हुए ) अच्छा ! कीजिए। 
वे - तो लिखिए.....
             "बिना किसी सवाल, 
          मैं झेलूँ रोज एक बवाल !
          आलू छोटे आ गए तो बवाल !
          भिंडी बड़ी आ गई तो बवाल !
          गीला तौलिया बिस्तर पर, छोटा बवाल !
          दफ्तर से फोन ना किया, बड़ा बवाल !.....
मैं - बस ! बस ! ये आप कविता बना रहे हैं या एक नए बवाल की भूमिका ?
वे - डियर, मैं तो बस आपकी मदद.....
मैं - रहने दें आपकी मदद । मैं लिख लूँगी कुछ ना कुछ । पता है, पिछली बार 'अलाव' विषय पर लिखकर भेजा था, तो मेरी रचना पाँचवें नंबर पर आई थी। 
वे - अच्छा ! पर मुझे लगता है कि विषय 'अलाव'के बजाय 'पुलाव' होता तो आप ही पहले नंबर पर होतीं!!!

( मैंने आँखें तरेरकर देखा। उन्होंने मासूम बच्चे की तरह कान पकड़ लिए, ....सॉरी !!! )

वे - एक और आयडिया आया है । आपने वो गाना सुना है ? 'एक सवाल मैं करूँ, एक सवाल तुम करो, हर सवाल का सवाल ही जवाब हो....'
मैं - हाँ । 
वे - बन गई बात ! आप यूँ लिखिए --
        "इक बवाल मैं करूँ
       इक बवाल तुम करो !
       हर बवाल का,
       बवाल ही जवाब हो !"

( मैंने अपना सिर पकड़ लिया । )

मैं - हे भगवान ! आपको तो बताना ही नहीं चाहिए था। आपको साहित्य और कविता की कोई कद्र ही नहीं है। ना जाने कैसे नीरस इंसान हैं आप.... अजी, बवाल एक गंभीर विषय है। एक से एक संवेदनशील रचनाएँ आ रही हैं इस विषय पर और आप.....
वे - ( रजाई में मुँह घुसाकर ) लो चुप हो गया। वरना फिर से शुरू हो जाएगा एक नया...... 
दोनों साथ - बवाल !!!!
           

शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

तीन दिन की छुट्टी

रिया की तीन दिन की छुट्टी है। महाशिवरात्री, चौथा शनिवार, रविवार। रिया सोच रही है कि इस वीकएंड अच्छे से आराम करेगी और कहीं आसपास घूमने भी जाएगी। 
       हर रोज तो सुबह सात बजे स्कूल के लिए निकलना होता है। बेटे और पति का लंचबॉक्स, दूध गरम करना, चाय बनाना, पौधों को पानी देना, सुबह के अपने रोजमर्रा के काम करना इन सबके लिए सुबह पाँच बजे उठो तो भी उसे वक्त कम पड़ता है। फिर छोटे-छोटे कामों की तो गिनती ही नहीं जैसे अपनी पानी की बोतल, चाय का थर्मस, नाश्ते का टिफिन तैयार करना, पूजा करना आदि। माँ कहती है कि सुबह की झाड़ू लगाए बिना घर से निकलना अच्छा नहीं होता। वनिता यानि कि कामवाली तो दोपहर तीन बजे आती है, तब तक झाड़ू भी ना लगाना,जूठे बर्तन रखे रहना रिया को भी पसंद नहीं है। माँ ने संस्कार तो घुट्टी में घोलकर पिला दिए, काश ! थोड़ा ये भी सिखा दिया होता कि अपना भी ख्याल रखा करे।
    हाँ, तो रिया की तीन दिन की छुट्टी है। 
अरे ! बात अधूरी रह गई। छुट्टी का नाम सुनते ही मन बल्लियों उछलने लगा , क्यों ? अजी, अभी दिनचर्या पूरी नहीं हुई। दोपहर दो बजे रिया स्कूल से लौटती है तो अकेली नहीं, होमवर्क साथ लेकर। साप्ताहिक, मासिक, वार्षिक, अर्धवार्षिक परीक्षाएँ, दसवीं के बच्चों की दो बार पूर्वतैयारी की परीक्षाएँ होती हैं, सो पेपर्स जाँचने के लिए घर पर लाने पड़ते हैं। कभी कापियाँ भी घर लानी होती हैं जाँचने के लिए। कभी फीस का हिसाब लिखना होता है। कभी कोई रिपोर्ट बनानी है। कभी कुछ तो कभी कुछ काम लगा ही रहता है। अगले दिन के पाठ की पूर्वतैयारी करनी होती है। दोपहर में खाना खाकर कभी थोड़ा सो लेती है, कभी नहीं। शाम पाँच बजे से कभी सात तो कभी आठ बजे तक उसके कोचिंग क्लास का वक्त है। घर की आर्थिक स्थिति को सँभालने के लिए यह अतिरिक्त काम करना उसकी मजबूरी है। वहाँ से लौटकर एक चाय, शाम की पूजा, रात का खाना पकाना....
लो जी, हो गया दिन खत्म ! रात के दस बजे याद आता है कि स्कूल या क्लासेस का कुछ जरूरी काम रह गया है। अंततः रात के ग्यारह से बारह के बीच वह पूरी तरह निढाल होकर बिस्तर पर पड़ जाती है, बेजान सी !
  और आज वह खुश है क्योंकि पिछले तीन महीनों से लगातार उत्तरपत्रिकाएँ जाँचने के बाद, स्कूल के दसियों कार्यक्रमों का अतिरिक्त कार्यभार पूरा होने के बाद, मायके और ससुराल की कई जिम्मेदारियों से लगातार जूझने और उन्हें सफलतापूर्वक निपटाने के बाद ये तीन दिन की छुट्टी आ रही है। रिया अपनी सहेली वर्षा के साथ बतियाते स्टाफ रूम से निकल ही रही है कि चपरासी आता है। 
"रिया मैम, छुट्टी में प्रिंसिपल ने बुलाया है।"
"ठीक" रिया के मन में संदेह का कीड़ा कुलबुलाने लगता है। क्या पिछली छुट्टी की तरह ये भी..... 
" आइए रिया, ये पुस्तकें हैं कक्षा सातवीं से नौवीं की। साथ में सिलेबस भी है वार्षिक परीक्षा का। आप हिंदी और मराठी के पेपर्स सेट कर दीजिए। तीन दिन छुट्टी भी है तो आप आराम से करके सोमवार को दे पाएँगी।"
 आ गया ना हलुवे में कंकड़ !!! रिया जानती थी प्रिंसिपल इन तीन छुट्टियों में कोई काम ना दे ऐसा हो ही नहीं सकता।
वह चुपचाप पुस्तकें उठा लेती है और बाहर निकल आती है।
रात में क्लास से मैसेज आया है। 
"रिया मैम, क्लासेस के दस बारह टॉपर्स ने हिंदी और मराठी के तीन तीन पेपर्स हल कर रखे हैं। आप जाँचकर सोमवार को दे दें। अब कल से तीन दिन क्लास भी बंद है।" 
बच्चों का पहला पेपर मराठी है चार मार्च को, सालभर उन्हें पढ़ाया है। उनके पेपर्स समय पर नहीं जाँचकर दिए गए तो उनके उत्साह पर पानी फिर जाएगा। 
"ठीक है सर। कल सुबह घर पर भिजवा दीजिए।" रिया मैसेज का उत्तर दे देती है।
     तीन दिन रिया की छुट्टी है। पति भी घर पर हैं। रोज की अपेक्षा कुछ अच्छा तो पकाना चाहिए। जेठजी की तबीयत सीरियस हो रही है, उन्हें भी मिल आना होगा। तभी सहेली का फोन आता है - " इस वीकएंड मिलते हैं क्या, जून से नहीं मिले। मौसम भी सुहाना है।" रिया असमर्थता जताती है। 
ननद का फोन है। बेटी की शादी अच्छी जगह हो जाने से फूली नहीं समा रही हैं। बेटी मुंबई में ही ब्याही गई है। 
"सुन, मैं और तेरे जीजाजी रोशनी को लेने आ रहे हैं 22 को, सुबह तेरे घर आकर शाम को बेटी के पास चले जाएँगे।"
नकली प्रसन्नता जताते हुए रिया फोन रख देती है। तीन दिन की छुट्टी है। 
   तभी कुछ और याद आता है।  कुछ काम और भी हैं। दो अधूरी लिखी कहानियों को पूरा करना है। एक मित्र ने अपनी कुछ रचनाओं को पढ़कर क्रम से लगा देने को कहा है। ना हो पाने पर वे क्या सोचेंगे? माँ की तबीयत भी ठीक नहीं है, उनसे मिलने लगभग हर रोज ही जाना होता है।
प्यारी माँ ! कुछ भी हो, मैं आऊँगी कल भी। माँ की वृद्धावस्था,अकेलेपन और मजबूरियों का अहसास समेटते हुए रिया आँखें बंद कर लेती है। पापा को याद करके दो बूँदें आँखों से ढुलक पड़ती हैं....
  रात को सोने से पहले रिया टाइम मैनेजमेंट करने पर विचार कर रही है। तीन दिन की समय सारिणी बना ली। घूमना, सुबह देर तक सोना, बगीचे के पौधों को समय देना, समाजसेवी संस्था में जाना कैंसिल। बाकी कार्यों को वरीयता श्रेणी के आधार पर ऊपर नीचे करके देख लिया। सबको समय मिल जाएगा। कोई बात नहीं। छुट्टियाँ आगे भी आती रहेंगी।
    समय सारिणी में सब कुछ है। सिर्फ रिया कहीं नहीं है। 

   

बुधवार, 31 जुलाई 2019

मंथन (भाग 1)

रचना एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षिका है। नौवीं और दसवीं कक्षा के बच्चों को पढ़ाती है। बी.एस.सी. बी. एड. होने पर भी शादी के बाद पाँच वर्षों तक घरेलू जिम्मेदारियों के कारण नौकरी का इरादा नहीं किया। वृद्ध सास ससुर गाँव में रहते थे सो उनकी सेवा के लिए कभी महीने दो महीने गाँव चली जाती। पति की नौकरी पुणे में थी इसलिए कुछ समय बाद पुणे आना पड़ता। परिस्थितियाँ चलचित्र की कहानी की तरह तेजी से मोड़ लेती गईं। सास-ससुरजी स्वर्ग सिधार गए। रचना एक बेटे की माँ बन गई। इधर कुछ कारणवश रचना के पति की नौकरी चली गई। रचना ने नौकरी की तलाश की। जल्दी ही उसे एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षिका की नौकरी मिल गई। तब तक उसका बेटा दीपक तीन वर्ष का हो चुका था. उसने अपने ही स्कूल में दीपक का दाखिला करा लिया ताकि साथ ले जाए और साथ ले आए। 

घरेलू परिस्थितियाँ ऐसी थी कि रचना के पति की नौकरी छूट चुकी थी। बिजनेस किया तो वहाँ भी घाटा ही हुआ। घर के पास ही एक दुकान किराए पर लेकर खोल ली, पर वह भी नहीं चली। 
उसमें भी कोई खास आमदनी नहीं हो रही थी ।

रचना शाम को घर पर ट्यूशन भी पढ़ा लेती थी । जिससे घर खर्च तो ठीक से चल जाता था । किंतु परिवार में अन्य खर्चे भी लगे रहते थे, जैसे लेन-देन, रिश्ते निभाना, शादी-ब्याह के न्यौते आदि के खर्चे। सारांशतः बचत तो शून्य ही थी।

ऐसे करते - करते दीपक ने सातवीं कक्षा पास कर ली। वह पढ़ाई में बहुत तेज था । उसके अंक कभी 90 प्रतिशत से कम नहीं आए। अपनी इकलौती संतान को लेकर रचना के मन में बहुत सपने थे। वह उसे इंजिनीयर बनाना चाहती थी। उसकी आगे की पढ़ाई में बहुत पैसा खर्च होगा, यह बात रचना के पति विजय के मन में भी बैठ गई थी। अतः उन्होंने कमजोर बिजनेस और दुकान को समेटकर फिर नौकरी की कोशिश शुरु कर दी। जल्दी ही उन्हें एक प्राइवेट कंपनी में एरिया सेल्स ऑफिसर की नौकरी मिल गई। काम के सिलसिले में तीन - तीन महीने घर से दूर रहना पड़ता था। तीन चार दिन के लिए लौटते और फिर वापस चले जाते टूर पर।

आठवीं कक्षा में दीपक तेरह वर्ष पार कर चुका था। इस उम्र में बच्चों में कई शारीरिक व मानसिक बदलाव आते हैं। उनको अब माता - पिता के संग - साथ की अधिक आवश्यकता होती है। दीपक को पिता का साथ व मार्गदर्शन बहुत ही कम मिल रहा था। वहीं रचना को एक कोचिंग सेंटर में पढ़ाने का प्रस्ताव मिला। वहाँ बढ़ोतरी की काफी संभावना थी। रचना ने दीपक से बात की तो दीपक ने एक समझदार बच्चे की तरह मम्मी की समस्या का हल  निकाल दिया । उसने वादा किया कि वह शाम को अकेले घर पर रह लेगा और कोई शरारत नहीं करेगा। रचना ने कोचिंग सेंटर जॉइन कर लिया। वह स्कूल से आने के बाद दीपक को थोड़ी देर खेलने देती थी। फिर खिला - पिला कर सुला देती और थर्मस में दूध रखकर, शाम का नाश्ता तैयार कर वह साढ़े तीन बजे कोचिंग सेंटर में पढ़ाने चली जाती। बाहर से ताला लगा जाती घर को। दीपक नींद पूरी करके उठता,ऩाश्ता करता, दूध पीता और स्कूल से मिला गृहकार्य पूरा करता। कभी ड्राईंग कर लेता तो कभी टी वी देख लेता था । शाम सात बजे रचना घर लौटती थी और दीपक को थोड़ी देर खेलने बाहर भेजती थी. खुद रात का खाना बनाकर और अन्य काम निपटाकर दीपक की पढ़ाई कराती। छःमाही परीक्षा तक सब सही चला। 
दीपावली की छुट्टियों के बाद जब दीपक फिर से स्कूल जाने लगा तब उसके व्यवहार में परिवर्तन दिखने लगा । स्कूल के शिक्षक रचना को आदर्श शिक्षिका मानते थे और उसकी बहुत इज्जत करते थे । रचना को बुलाकर दीपक की शिकायत देना उनके लिए भी तकलीफ वाला काम था, फिर भी उन्हे अपना कर्तव्य तो निभाना था । दीपक पढ़ाई में ध्यान नहीं दे रहा, आज कक्षा में सो गया, दूसरों को डिस्टर्ब करता है, आज टीचर को उल्टा जवाब दिया, बेवजह हँसते रहता है जैसी शिकायतें आने लगीं। रचना रोज उसे समझाती, कभी डाँटती और कभी कोसती भी कि तेरी वजह से स्कूल में मेरा नाम खराब हो रहा है।

उधर दीपक कहता - माँ आपने मुझे अपने स्कूल में क्यों  डाला ? क्या मैं अकेला ही शरारत करता हूँ?  और बच्चे भी तो करते हैं। पर टीचर्स मुझे ही ज्यादा डाँटते हैं क्योंकि मैं आपका बेटा हूँ ना ! अनीता टीचर सब बच्चों के सामने अपमान करती हैं। कहती है - “तू तो किसी भी एंगल से रचना टीचर का बेटा नहीं लगता, कहाँ माँ कहाँ बेटा!” फिर मैं उनको उल्टा जवाब क्यों न दूँ? 

अन्य बच्चों से तुलना होने पर दीपक के कलेजे पर छुरियाँ चल जाती और वह विद्रोही होता चता जा रहा था। अगले पीरियड में उस टीचर को तंग करने की नई योजना बनाता या फिर टीचर की हर बात पर  भावहीन, निर्विकार चेहरा बनाकर उसे जता देता कि बकती रहो मेरी बला से।

जैसे तैसे आठवीं का वर्ष पूरा हुआ। दीपक के 80 प्रतिशत अंक आए और कक्षा में पाँचवाँ स्थान। पहले दूसरे स्थान पर आने वाला बच्चा पिछड़ रहा था और इससे रचना मानसिक रूप से परेशान रहने लगी। उसने दीपक  से उम्मीदें भी तो बहुत ज्यादा लगा रखी थी ।
( क्रमश:)

मंगलवार, 30 जुलाई 2019

कमला (भाग - 2)

(गतांक से आगे)
गाँव मे दशहरे दीवाली के आसपास अनेक कलाकार, गायक, नाच - तमाशेवाले अपना हुनर दिखाकर कुछ कमाने की आस में चले आते थे। इस समय किसान भी फसल कटाई करके फुर्सत में और आनंदित रहते थे। कीर्तन, प्रवचन, गायन, नृत्य, रामलीला आदि सांस्कृतिक कार्यक्रम पूरे कार्तिक माह चला करते। उस वर्ष अपनी मंडली के साथ गाँव में दाखिल हुआ, एक उत्कृष्ट गायक – सुंदर ।
सुंदर की तारीफें अजेयसिंह तक पहुँचीं और उनके आमंत्रण पर एक दिन हवेली में सुंदर की स्वर लहरियाँ गूँज उठीं। खास मेहमानों के साथ कमला भी श्रोताओं में उपस्थित थी। आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी सुंदर ने अपने दिव्य गायन से सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। सुंदर के सुरों में कमला ऐसी खोई कि टकटकी लगाकर उसे देखती रह गई। हर गीत पर कमला की तालियाँ, उसके चेहरे से टपकती प्रशंसा ने सुंदर का ध्यान आकर्षित किया। यह सौंदर्य की मूरत है या साक्षात कला की देवी सरस्वती ? सुंदर का मन उसी क्षण अपना स्थान छोड़, कमला के पास चला गया था। उस रात सुंदर का हर गीत, हर सुर सिर्फ कमला के लिए था।  
नियत समय पर सारी कला मंडलियाँ पुरस्कार, इनाम पाकर अपने अपने स्थान को लौट चलीं किंतु सुंदर बीमारी का बहाना बनाकर गाँव में ही रुक गया। उसने गाँव में एक मित्र बना लिया था। उसी के घर रहता था। 
कुछ ही दिनों में गाँव के बाहर सूनी दोपहरी में क्षिप्रा तट पर एक अलग ही महफिल सजने लगी, सुंदर और कमला की गुप्त महफिल ! मिलन के मूक गीत, प्रेम के खामोश सुर और स्पर्श की मौन स्वर लहरिय़ाँ अमराई से लेकर क्षिप्रा तट तक बिखरने लगीं। सुंदर के प्रेम में आकंठ डूबी कमला कहाँ जान पाती कि उसके भाग्य में क्या बदा है ?
एक दिन एक वफादार नौकर ने देख ही लिय़ा और उनके प्रेमगीतों की गूँज ठाकुर अजेयसिंह के कानों तक पहुँच ही गई। उसी रात हवेली में सुंदर और कमला के प्रेम की चिता तैयार की गई। हवेली के पीछे बाग में सुंदर के शरीर से चमड़ी उधेड़ी जा रही थी तो दूसरी ओर पुआल की कोठरी में कमला को मार - मार कर बेदम किया जा रहा था। 
उस रात के बाद सुंदर को किसी ने नहीं देखा। वह कहाँ गया, पूछने का ना किसी में साहस था ना जरूरत थी। जिसे जरूरत थी, वह जब होश में आई तो उसके होठ हिलकर रह गए। उस रात के बाद कमला कभी नहीं बोली। खौफ ने उसकी वाणी को छीन लिय़ा था।

कुछ दिनों की कानाफूसी के बाद गाँव की जिंदगी अपने ढ़र्रे पर आ गई लेकिन कमला जीवन भर उसी एक रात को भोगती झेलती रही। एकांत को उसने अपना चिरसंगी बना लिया था। आया उमादेवी के स्नेह ने उसे मरने से तो बचा लिया था किंतु वह जीवित लाश-सी बनकर रह गई थी। अजेयसिंह से अपनी लाडली बेटी की यह दशा देखी नहीं जाती थी। कभी - कभी उन्हें लगता कि उन्होंने कमला के साथ अच्छा नहीं किया। कमला के मनोरंजन के लिए उन्होने अपने प्रयत्नों में कोई कमी नहीं छोड़ी लेकिन वह तो पाषाण हो गई थी जैसे.....
कुछ वर्ष बीते। फिर कब कमला हवेली की चौखट पार कर बाहर आने लगी, कब सुबह से साँझ तक क्षिप्रा तट पर बैठने लगी, किसी को याद नहीं। कभी - कभी वह गाँव में आ निकलती….उसके हाथ में एक गठरी होती, जिसमें क्या था, किसी को पता नहीं। बच्चे पगली - पगली कहकर चिढ़ाते तो मारने दौड़ती और वापस नदीतट पर जाकर बैठ जाती। दोपहर को उमादेवी उसे जबरन घर ले जाकर कुछ खिला - पिला देतीं। दोपहर बाद पुनः कमला नदिया किनारे पत्थर पर बैठी पाई जाती। साँझ ढलने पर उमादेवी उसे ले जातीं। उसे कैद करके रखने की कोशिश की गई तो उसने अन्न जल ही त्याग दिया। लाचार होकर सबने उसे अपने हाल पर छोड़ दिया।
कई वर्ष बीत गये। अजेयसिंह पर वृद्धावस्था का प्रभाव दिखाई देने लगा। उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा था। कमला के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया। परिवर्तन सिर्फ भौतिक शरीर में आया। सौंदर्य की प्रतिमा कमला अब कुरूप लगने लगी। बड़ी - बड़ी खूबसूरत आँखें गड्ढों में धँस गईँ। तपे कुंदन सा रंग साँवला पड़ गया था। कुछ नहीं बदला था, तो काले-घने मेघों सी वह घुटनों तक पहुँचती केशराशि.....
एक दोपहर वृद्ध अजेयसिंह लाठी टेकते हुए क्षिप्रा किनारे पहुँचे। अपराध बोध से वे भी टूट चुके धे अंदर ही अंदर….. 
धीमे – धीमे चलते कमला के पास जाकर बैठ गए। कमला ने एक बार नजर उठाकर उन्हें देखा। फिर उसी तरह निर्विकार बैठी, बहते जल को ताकती रही। अजेयसिंह ने कमला के कंधे पर हाथ रखकर कहा, “बिटिया, मुझे माफ कर दो।"
कमला ने अपनी सूनी आँखें पिता की नजरों में उतार दीं। उस दृष्टि से अजेय सकपका गए। उस दृष्टि का सामना करने की अजेयसिंह में हिम्मत नहीं थी। निगाहें शून्य में गड़ाकर, अपना काँपता हाथ कमला के सिर पर फेरते हुए बोले - "बिटिया, मेरे जाने की घड़ी नजदीक आ रही है। मेरे पीछे तुझे कौन सँभालेगा ? तेरी चिंता से बँधे ये पापी प्राण मुक्त नहीं हो पाएँगे....साँसें अटकेंगी मेरी तुझमें!!! सुंदर कभी नहीं आएगा, मर चुका है वह.....मैंने ही मरवा दिया था उसे...."
अचानक ना जाने क्या हुआ, विक्षिप्त से अजेयसिंह खड़े हुए, कमला के कंधों को पकड़ उसे झकझोरकर अट्टहास करते हुए बोले, " सुन रही है तू ? मैंने ही मरवा दिया था उसे!"
फिर कुछ क्षणों बाद वह विक्षिप्त अट्टहास कातर रुदन में बदल गया.....
पर कमला वैसी ही बैठी रही....निर्विकार और सुन्न!!! पत्थर की मूरत !!!
पगलाए से अजेयसिंह शिथिल कदमों से लौट गए।

साँझ ढलने से कुछ पूर्व, अपनी गठरी को सीने से चिपकाए कमला क्षिप्रा की गहरी धार में उतरती  चली गई.....
गाँव के बालक कभी-कभी पूछते – ‘वह पगली कहाँ चली गई?’
………  

सोमवार, 29 जुलाई 2019

कमला (भाग - 1)

क्षिप्रा की हरियाली घाटियों के बीच बसा हुआ था एक छोटा सा खूबसूरत गाँव – रुद्रपुर । गाँव के पास से बहती हुई क्षिप्रा अल्हड़ बालिका के समान उछलती कूदती नहीं थी बल्कि शांत – सुघड़ नवयौवना सी मंद-मंथर चाल से बहती जाती थी । इसी सुंदर सरिता तट पर दूर - दूर तक फैले हरे भरे खेत, उसके बाद आम की सघन अमराई और अमराई से लगकर था  ग्रामदेवी का सुंदर मंदिर।
यहीं से शुरू होती थी गाँव की सीमा। सीमा सें प्रवेश करते ही नजरों को बाँध लेती थी लाल पत्थरों की एक विशालकाय हवेली ! ठाकुर अजेयसिंह की वह हवेली गाँव की शान भी थी और ग्रामवासियों के आदर सम्मान का केंद्र भी । अजेयसिंह के दादा सुजेयसिंह ने बनवाई थी वह हवेली, जो अपने जमाने के बड़े रईस थे। समय के साथ जमींदारी गई। रईसी शौकों की वजह से खजाना खाली होने लगा लेकिन हवेली की आन - बान में कोई कमी नहीं आई। जमीन जायदाद अभी भी बहुत थी और गाँव में अजेयसिंह का सम्मान भी कम नहीं था।
विवाह के आठ वर्ष बाद अजेय की पत्नी तारा की गोद एक कन्या रत्न से भरी। इस संतान के लिए पति पत्नी ने बड़ी मन्नतें माँगी थीं, पूजा पाठ किए थे। बेटे की आस थी ताकि वंशवृद्धि हो किंतु इतने दिनों बाद संतान होने की खुशी भी कम ना थी। बेटी थी भी तो कितनी सुंदर. परीकथाओं की परियों सी ! केशर घुले दूध सा वर्ण, बड़ी - बड़ी गहरी काली आँखें, घनी पलकें, कमल नाल सा नाजुक शरीर ! कमल के फूल सी सुंदर, लक्ष्मी सी बिटिया का नाम रखा गया – कमला ।
किंतु विधाता को कुछ और ही मंजूर था। कमला के जन्म के छः महीने बाद ही तारा स्वर्ग सिधार गई। कमला को सँभालने की जिम्मेदारी आया उमादेवी को सौंपकर अजेयसिंह ज्यादातर घर से बाहर ही रहने लगे। काम में डूबे रहने से पत्नी के बिछोह का गम कुछ हद तक भूल जाते थे। इधर कमला अपने दुर्भाग्य से अनजान, हँसती किलकारी मारती, सारी हवेली में अपने नन्हे - नन्हे पैरों की पायल छनकाती, दौड़ने लगी। चंचलता के साथ - साथ स्वतंत्रता का गुण भी उसमें जन्मजात ही था। उसके मन के विरुद्ध कोई भी उससे कुछ भी नहीं करा सकता था। ना नहलाना, ना खिलाना। 
जबर्दस्त मनमौजी लड़की थी कमला ! अजेयसिंह थोड़ा बहुत समझाते और यह सोचकर छोड़ देते कि वक्त के साथ सीख जाएगी। आया उमादेवी परेशान होती। नियम, संस्कार, अनुशासन सिखाने का हर प्रयत्न विफल रहा था। कमला के ऐसे लक्षण देख कर अजेय ने उसे पढ़ाने-लिखाने का विचार स्थगित ही कर दिया था।
जैसे - तैसे कमला तेरह वर्ष की उम्र तक पहुँच गई। बात-बात पर ऐसा खिलखिला कर हँसती कि सूनी हवेली की दीवारें खनक उठतीं। आया उमादेवी उसे शांत संयमी बनने का पाठ पढ़ाती, मगर उद्दाम वेग से बहती नदी को बाँध सका है कोई?  हवेली की दीवारें उसे कैद ना रख पातीं और वह अकेली बाहर निकल जाती। चौकीदार से लेकर नौकरों और खेतों में काम करने वाले मजदूरों पर उसका रोब चलता था। दो वर्ष ऐसे ही बीते ।
आखिर उसका विवाह कर देना ही एकमात्र उपाय सूझा। नजदीक के गाँव से अच्छा घर-वर देखकर धूमधाम से कमला का ब्याह रचा दिया गया। दो महीने में ही कमला ने ससुराल वालों की नाक में दम कर दिया। वहाँ भी वही, बच्चों सा कूदना - फाँदना, जोर - जोर से खिलखिलाकर हँसना. जब मन आए नहाना,जब मन आए खाना। बारिश आई तो पति का हाथ पकड़कर फुहारों में भीगने के लिए ले  गई। वह बेचारा हाथ छुड़ाकर यूँ अंदर दौड़ा मानो सैकड़ों मधुमक्खियों ने डंक मार दिया हो और कमला अल्हड़ बालिका सी छत पर खड़ी बारिश में भीगने का मजा ले रही थी, उछल रही थी, तालियाँ पीट रही थी ! बालिका ही तो थी वह, आदर्श कुलवधू के गुण उसमें ना आने थे और ना आए। 
यह दृश्य देखकर सास ननद ने अपना सिर पीट लिया और अगले ही दिन बड़ी समझदारी से उसे मायके पहुँचा दिया, यह कहकर कि लड़की मतिमंद है। अजेयसिंह पर मानो बिजली गिर पड़ी। घंटों अपनी पत्नी तारा के चित्र के आगे बैठे आँसू बहाते रहे मानो पूछ रहे हों, कैसे सँभालूँ मैं तुम्हारी लाडली को ? बेटी से प्रेम भी बहुत था और मान मर्यादा की चिंता भी कम नहीं थी। 
ससुराल से लौटने पर भी कमला उतनी ही प्रसन्न थी, उतनी ही खिलंदड़ी ! गाँव में दबे स्वर में बातें होतीं। सामने कुछ कहने का साहस किसमें था ?  इन सबसे बेखबर कमला, खेतों से बगीचों तक, अमराई से क्षिप्रा त़ट तक भटकती रहती। पंछियों से, पेड़ों से, फूलों से, पत्थरों से बातें करती रहती। गाँव में अजेयसिंह का मान सम्मान और दबदबा इतना था कि अकेली स्वच्छंद सारे गाँव में भटकती कमला की ओर गलत नजरों से देखने की हिम्मत किसी में नहीं थी। 
समय बीतता गया। कमला सोलह वर्ष की हो गई। यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही उसके व्यवहार में परिवर्तन आया। स्वच्छंद, बेलगाम और बेखौफ स्वभाव अब थोड़ा शांत, शालीन और अंतर्मुख होने लगा। इस बात से पिता अजेय और आया उमादेवी ने राहत की साँस ली।     
( क्रमशः ) 

मंगलवार, 2 जुलाई 2019

काश !


"माँ, नदी देखने चलोगी ?"

मेरे बीस वर्ष के बेटे ने ये सवाल किया तो लगा सचमुच वह बड़ा हो गया है । वह अच्छी तरह जानता है मुझे नदी देखना कितना अच्छा लगता है।

बारिश के मौसम में उफनती नदी को देखना ऐसा लगता है मानो किसी ईश्वरीय शक्ति का साक्षात्कार हो रहा हो । रेनकोट पहनकर मैं तुरंत तैयार हो गई । तेज बारिश हो रही थी। दस मिनट में हम पुल पर थे जिसके नीचे से उल्हास नदी अपने पूरे सौंदर्य और ऊर्जा के साथ प्रवाहमान हो रही थी ।

"बाबू , चल ना दो मिनट किनारे तक चलें, कोई रास्ता है क्या
नीचे उतरने का ?" मैंने पूछा।

"हाँ , है तो । लेकिन सिर्फ दो मिनट क्योंकि इस समय काफी सुनसान रहता है वहाँ नीचे। पुल के ऊपर से आप चाहे जितनी देर देख लो ।"

पुल से नीचे उतरने वाली ढलान पर गाड़ी रोक कर लॉक की और हम नीचे उतर कर नदी के किनारे खड़े हो गए ।

उस वक्त नदी में कल-कल का संगीत नहीं था, घहराती हुई गर्जना थी .. तभी कुछ दूरी पर किनारे बैठे युवक की ओर ध्यान खिंच गया । वह घुटनों में सिर छुपाए बैठा था । दीन - दुनिया से बेखबर !

मैंने बेटे की ओर देखा लेकिन मेरे कुछ कहने से पहले ही मेरा समझदार सुपुत्र बोल उठा, "बस, अब आप कुछ कहना मत । वह लड़का वहाँ क्यों बैठा है, कौन है , ये सब मत पूछना प्लीज.. अब जल्दी चलें यहाँ से।"

"लेकिन वह अकेला क्यों बैठा है ? डिप्रेशन का शिकार लग रहा है बेचारा।"
     
"कुछ नहीं डिप्रेशन - विप्रेशन । ये अंग्रेज चले गए डिप्रेशन छोड़ गए । जिम्मेदारियों से भागने का सस्ता और सरल उपाय! बस डिप्रेशन में चले जाओ । आप नहीं जानतीं। ये चरसी या नशेड़ी होगा कोई । आप चलो अब ।"

"अरे , मैं नहीं बात करूँगी, तू तो एक बार पूछ कर देख। शायद उसे किसी मदद की जरूरत हो ।"

"नहीं ममा, आप चलो अब । बारिश बढ़ गई है और यह जगह
कितनी सुनसान है ।" अब बेटे के स्वर में चिढ़ और नाराजगी साफ जाहिर हो रही थी ।

मजबूर होकर मैं घर चली आई । घुटनों में सिर छुपाए बैठा वह लड़का दिमाग से निकल ही नहीं रहा था ।

अगले दिन.....सुबह सैर के लिए निकली । पड़ोस के जोगलेकर जी हर सुबह नदी किनारे तक सैर करके आते हैं । मैं नीचे सड़क पर आई तो वे मिल गए । हर रोज की तरह प्रफुल्लित नहीं लग रहे थे ।  मैंने पूछा -- "क्या बात है भाई साहब, तबीयत ठीक नहीं है क्या ?"

थके से स्वर में बोले, "क्या बताऊँ, सुबह-सुबह इतना दुःखद दृश्य देखा । नदी से दो लाशें निकाली हैं पुलिस ने । एक लड़के और लड़की की । आत्महत्या का मामला लग रहा है ।"

मेरा सिर चकरा गया । घुटनों में सिर छुपाए वह लड़का आँखों के सामने घूम गया । कहीं वही तो नहीं.....

जिंदगी में अनेक बार ऐसे प्रसंग आए हैं जब घटना घटित हो जाने के बाद सोचती रह गई हूँ --

काश.......

शनिवार, 1 जून 2019

अभिलाषा


कभी तुझसे कोई शिकायत नहीं हो
चाहे जैसे रहूँ चाहे जो भी सहूँ !
कभी तुझसे कोई....

तू परछाईं जैसे मेरे संग रहना
ये संसार अपना लगे चाहे सपना,
मैं सब में हमेशा तुझे खोज लूँ !
कभी तुझसे कोई ....

बढे चाहे जिम्मेदारियों का बोझ जितना
रहे मुझसे दुनिया खफा चाहे कितना,
मैं आँचल तेरे प्यार का ओढ लूँ !
कभी तुझसे कोई...

मिले वक्त थोड़ा , रहे काम ज्यादा
ना भूलूँ कभी जो किया तुझसे वादा,
मैं साए में तेरे हमेशा रहूँ !
कभी तुझसे कोई...

भटकने लगूँ गर मैं राहों से अपनी
तो तू रोक देना निगाहों से अपनी,
मैं हर वक्त तेरी नजर में रहूँ !
कभी तुझसे कोई...

कभी तुझसे कोई शिकायत नहीं हो
चाहे जैसे रहूँ चाहे जो भी सहूँ !
कभी तुझसे कोई..

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वटवृक्ष ओर जूहीलता

  गाँव की कच्ची पगडंडी के किनारे बहुत से वृक्ष थे. नीम, पीपल, कनेर, बहुत सारे. पर उनमें खास था एक बरगद का पेड़ - बहुत बड़ा, विशाल और बहुत ही...

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